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विद्याभारती के संस्थापक “कृष्णचन्द्र गांधी”

भारत में 50,000 से अधिक विद्यालय जिस व्यक्ति की प्रेरणा से चल रहे हैं, उन महापुरुष को आज भी कम ही लोग जानते होंगे। वे विद्याभारती के संस्थापक “कृष्णचन्द्र गांधी” थे… वे यह कहते हुये जीवनभर हाथ रिक्शे में नही बैठे कि आदमी का बोझ दूसरा आदमी क्यों खींचे?

देशभर के हजारों शिशु मन्दिर और विद्यामन्दिर के संस्थापक गांधी करीब 10 किलो का अपना बैग हाथ में लेकर चलते थे… संघ के संस्कारों को करोड़ों बच्चों में पहुंचाने वाले व्यक्ति को शिक्षक दिवस(5 sept) पर नमन है… ये भारत के ऐसे शिक्षक थे जिन्हें आज याद किया जाना आवश्यक है। सरस्वती शिशु मंदिर योजना के जनक कृष्णचंद्र गांधी…

वेश से तो नहीं; पर मन, वचन और कर्म से साधु स्वभाव के श्री कृष्ण चंद्र गांधी का जन्म विजयादशमी, 1921 को मेरठ, (उ.प्र.) में श्री मुरारीलाल मित्तल के घर में हुआ था। छात्रावस्था में वे सर्दियों में भी नहाकर केवल धोती पहनकर ध्यान करते थे। यह सादगी देखकर लोग उन्हें ‘गांधी जी’ कहने लगे। तब से उनका यही नाम प्रचलित हो गया।

1943 में वे स्वयंसेवक बने। सुगठित शरीर होने के कारण शाखा के शारीरिक कार्यक्रम उन्हें बहुत भाते थे। संघ में घोष के साथ ही उन्हें घुड़सवारी व तैराकी भी बहुत प्रिय थी। 1944 में बी.ए. करने के बाद वे प्रचारक बन गये।

1952 में गांधी जी गोरखपुर में विभाग प्रचारक थे। उन दिनों नाना जी देशमुख भी वहीं थे। इन दोनों ने प्रांत प्रचारक भाऊराव देवरस के आशीर्वाद से वहां पहला सरस्वती शिशु मंदिर खोला। आज वह बीज वटवृक्ष बन चुका है, जिसकी देश में 50,000 से भी अधिक शाखाएं हैं। इसके बाद भाऊराव ने उन्हें इसके विस्तार का काम सौंप दिया।

फिर तो गांधी जी और शिशु मंदिर एकरूप हो गये। लखनऊ में सरस्वती कुंज, निराला नगर तथा मथुरा में शिशु मंदिर प्रकाशन उन्हीं की देन हैं। इतना करने के बाद भी वे कहते, ‘व्यक्ति कुछ नहीं है। ईश्वर की प्रेरणा से यह सब संघ ने किया है।’
(courtesy Quora))

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