इंसान के जीवन में सत्यता, आत्म सम्मान और शिक्षा महत्वपूर्ण

-प्रस्तुति-डा. अनूप निगम
मेरे दादा जी का देहांत तब हो गया था जब मेरे पिताजी (डॉ. बी. एल. निगम ) की आयु मात्र चार-पाँच वर्ष की थी। परिवार अत्यंत आर्थिक कठिनाइयों में था। मेरी दादी जी बाजार में टॉफी की छोटी दुकान चलाती थीं। उन्होंने उज्जैन की भैरवनाथ गली में एक कच्चा मकान और साथ में एक छोटा मंदिर बनवाया था। घर की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए पिताजी मालीपुरा की एक प्रकाशन दुकान पर काम करते थे। पुस्तकों के बंडल रेलवे स्टेशन तक ले जाकर बुक करवाना भी उनके कार्यों में शामिल था। दिनभर दुकान पर काम करके वे अपनी माता के साथ परिवार का भरण-पोषण करते थे। मेरी दादी जी पापड़, अचार आदि बनाकर घर से बेचती थीं।
(इस लेख में डा.अनूप निगम ने अपने पिताश्री स्वर्गीय डॉ. बी. एल. निगम के जीवन के संघर्ष को प्रस्तुत कर देश के हर नागरिक को प्रेरणा देने का कार्य किया है। कोई भी नागरिक अपने दिवंगतजनों के संस्मरण इस काॅलम में दे कर सभी को प्रेरणा देने का काम कर सकता है-संपादक)
ऐसी कठिन परिस्थितियों के बावजूद पिताजी ने माधव कालेज से बी.ए. और एम.ए. की शिक्षा प्राप्त की। इसी दौरान उन्हें हिंदी साहित्य में गहरी रुचि उत्पन्न हुई। इलाहाबाद से आने वाली साहित्यिक पत्रिकाएँ और समाचार-पत्र वे नियमित पढ़ते थे। उसी कॉलेज में प्रसिद्ध कवि एवं हिंदी साहित्य के विद्वान डा.शिवमंगल सिंह ’सुमन’ व्याख्याता के रूप में आए। पिताजी और डॉ. सुमन की जोड़ी ने हिंदी साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बना ली। लगभग चार-पाँच वर्षों तक दोनों का गहरा साहित्यिक संबंध रहा। बाद में सरकार ने डॉ. सुमन का स्थानांतरण इंदौर तथा पिताजी का अन्य कॉलेज में कर दिया।
इसी बीच पिताजी ने एम.ए. फिलॉसफी भी पूर्ण की। उनकी शादी आलोट क्षेत्र के एक ग्रामीण परिवार की कन्या श्रीमती प्रमिला निगम जी से तय हुई। उस समय उज्जैन रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर, जो पिताजी के विद्यार्थी थे, उन्होंने पूरी बारात को फर्स्ट क्लास में यात्रा करवाने की व्यवस्था कर दी।
शादी के दौरान एक ऐसी घटना घटी जिसने पिताजी के जीवन का महत्वपूर्ण निर्णय निर्धारित किया। बारात में एक मुस्लिम व्यक्ति भी सम्मिलित था। उस समय समाज में छुआछूत और हिंदू-मुस्लिम भेदभाव बहुत प्रबल था। मेरे नानाजी ने इस बात पर आपत्ति व्यक्त की। पिताजी ने उसी क्षण निश्चय कर लिया कि वे दोबारा ससुराल नहीं आएँगे। उन्होंने लगभग साठ-पैंसठ वर्षों तक अपने इस संकल्प का पालन किया। अनेक बार आग्रह और क्षमा-याचनाओं के बावजूद वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। केवल नानाजी की अंतिम यात्रा में वे दूसरी और अंतिम बार वहाँ गए।
ग्वालियर प्रवास के दौरान पिताजी ने अपने जीवन का दूसरा बड़ा निर्णय जीवन भर केवल खादी ही पहनेंगे का लिया। ऊपर से लेकर भीतर तक पूर्ण खादी धारण करना उन्होंने अपने जीवन का नियम बना लिया और इसे बड़े आनंद से निभाया, जबकि उनकी विचारधारा पूर्णतः गांधीवादी नहीं थी।
उन्होंने एक और अद्भुत संकल्प लिया कि वे कभी कोई वाहन नहीं खरीदेंगे ना स्कूटर और ना कार। जीवनभर वे केवल साइकिल से ही ग्वालियर, महू, रतलाम और इंदौर में आवागमन करते रहे। यहाँ तक कि हमारे द्वारा खरीदी गई कारों में भी वे तब तक नहीं बैठे जब तक उनके बैंक ऋण समाप्त नहीं हो गए।
पिताजी का पूरा जीवन सिद्धांतों और आत्मसम्मान का प्रतीक था। नौकरी के दौरान उनकी केवल दो पुस्तकें प्रकाशित हो पाईं, किंतु सेवानिवृत्ति के बाद उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हुईं।
जब वह माधव कॉलेज के प्राचार्य थे, तब छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर हड़ताल कर दी। उसी दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी कॉलेज पहुँचे और घोषणा की कि चाहे कॉलेज बंद करना पड़े, लेकिन प्राचार्य डॉ. बी. एल. निगम का स्थानांतरण नहीं किया जाएगा। इसके बाद छात्रों ने हड़ताल समाप्त कर दी।
बाद में राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं और आपात्काल के समय पिताजी पर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को समर्थन देने का आरोप लगाया गया। परिणामस्वरूप उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई। किंतु इंदौर उच्च न्यायालय में सरकार अपने आरोप सिद्ध नहीं कर पाई और अंततः उन्हें पुनः माधव कालेज में में नियुक्त करना पड़ा।
धीरे-धीरे आर्थिक कठिनाइयाँ समाप्त हुईं और शिक्षा तथा साहित्य के क्षेत्र में उनका प्रभाव निरंतर बढ़ता गया। डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन और डॉ.
लेखक का परिचय
(डा.अनूप निगम मध्यप्रदेश आईएमए के पूर्व स्टेट प्रेसीडेंट, प्रख्यात पैथालाजिस्ट और कई राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से सम्बद्ध होने के साथ ही वर्तमान में उज्जैन, मध्यप्रदेश में ही निवासरत हैं)
(UPDATED ON 16TH MAY 2026)

