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वक्त पर शरीर के हर अंग का उपयोग हो

-प्रकृति के उपहार सभी के लिए हैं। क्या बच्चा, क्या जवान, क्या बूढ़ा, क्या स्त्री., सभी को 24 घंटे का समय ईश्वर ने मुक्त भाव से दिया है। कोई भेदभाव ईश्वर ने नहीं किया है। अब इस 24 घंटे का समय अर्थात रात और दिन का उपयोग इंसान किस तरह से करता है यह उस पर निर्भर है। हर क्षण उपयोगी है। एक क्षण वर्तमान में होता है और दूसरा क्षण जगह लेने को तैयार होता है और ले लेता है और फिर पहला और दूसरा क्षण भूतकाल अर्थात पास्ट टाइम में हो जाते हैं और एक नया क्षण, एक नया मिनट, एक नया घंटा अर्थात 60 मिनट और फिर 24 घंटे निकल जाते हैं। अर्थात एक दिन गुजर जाता है। समय चक्र की गणना 24 घंटों मंे गई है। रात के 12 बजे का समय एक नये दिवस की शुरूआत करता है और उस वक्त समय होता है शून्यकाल अर्थात 0000। जी हां। शून्यकाल में 0000 ही होती हैं और फिर नये दिवस की शुरूआत का समय आरम्भ हो जाता है।

इंसान अपने समय का उपयोग कैसे करे इसके लिए उसके पास मस्तिष्क है। देखने के लिए आंखें हैं। समझने के लिए मानसिक शक्ति है। चलने के लिए पैर हैं और कुछ करने के लिए हाथ। इसी प्रकार सुनने के लिए कान हैं। सुंदरता को निहारने के लिए आंखें दी है। आपके गले में जुबान दी है जो कि खट्टे और मीठे अर्थात भोजन और पेय का स्वाद बताती है। शरीर को ऊर्जा से भरने के लिए पेट दिया गया है। आप जो भोजन करते हैं वह एक निश्चित समय तक ही पेट में रहता है। निश्चित समय के बाद यह भोजन मल बन जाता है और मल द्वार से बाहर आने का का संकेत करता है। आप भले ही नींद में हों, बस में हो, यात्रा कर रहे हों या अन्य काम लेकिन जब मल और मूत्र आना होता है तो आता ही है और आप उसे रोक नहीं पाते और ना ही रोक सकते हैं। अगर रोकने का प्रयास किया तो शारीरिक दिक्कतें आरम्भ हो जाती हैं।

कुल मिलाकर हर व्यक्ति प्रकृति से जुड़ा है। हमारे शरीर के जिन अंगों के बारे में इस लेख में बताया गया है उनका भावार्थ यही है कि इंसान को प्रकृति के साथ कदमताल करना ही होता है और करना भी चाहिये। अगर गलत दिशा में या गलत सोंच के साथ हम आगे बढ़ते या काम करते हैं तो उसके परिणाम भी गलत ही होते हैं। इसी प्रकार अगर हम मानसिक शक्ति का परिचय देते हुए सार्थक कार्य करते हैं तो उसके परिणाम भी सार्थक ही मिलते हैं। यह हो सकता है कि सार्थक परिणाम आने में समय लग जाए लेकिन सार्थक परिणाम आते ही हैं। इसका उदाहरण हम आपको विभिन्न प्रकार की फसलों एवं फल-फूट से भी दे रहे हैं। गेंहू या चावल, दाल अथवा तिलहन की फसल तुरंत ही नहीं पैदा हो जाती। उसमें समय लगता है और विभिन्न प्रकार के उपाय करने होते हैं तभी ये फसलें साकार रूप लेती हैं और इंसान उनका उपयोग कर पाता है। यही बात जिंदगी में अच्छे और बुरे कार्यों पर भी प्रकृति के अनुसार लागू होती है। अगर इंसान बुरा करता है तो उसका परिणाम भी नकारात्मक ही होता है।

कम शब्दों में इंसान प्रकृति के विशाल भावार्थ को समझ सकता है। उम्मीद है ये उदाहरण और सच्चाई आपका मार्गदर्शन करेगी। मृत्यु शाश्वत सत्य है और इस सत्य के आते-आते इंसान को प्रकृति के अनुरूप ही अपने को ढाल लेना चाहिये।

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