Top NEWS Stories

-आप जो गलती कर रहे हैं….. समझ लीजिए

-शेखर कपूर-
-नई दिल्ली-

हमें पता ही नहीं चलता है कि दूसरों को हमारी जरूरत है। यह तब पता चलता है जब हम अनुभव और संकटों के बीच से निकलते हुए मैच्यूर अर्थात परिपक्त होते हैं। जैसे कोई व्यक्ति जब गंदगी करता है तो हमारी परिपक्वता कहती है सामने वाला गलती कर रहा है। हम उसे टोकते भी हैं और कई लोग उस व्यक्ति से गलती सुधारने की कोशिश करते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि हम भी वही गलतियां एक उम्र में कर चुके होते हैं। हमें पर्यावरण और स्वच्छ हवा की जब आवश्यकता होती है अथवा हमें हरियाली का आनंद लेना होता है तो हम देखते हैं कि हमारे मुहल्ले में हरियाली ही नहीं है जबकि वास्तविकता यह होती है कि हमने यौवनावस्था में हरियाली को महत्व ही नहीं दिया। हमने कभी पौधारोपण ही नहीं किया। हमने कभी अपने मुहल्ले में लगे पेड़ों को पानी देने का काम ही नहीं किया और जब हरियाली या पर्यावरण को बनाने और विकसित करने की सोंचते हैं अर्थात ज्ञान की अनुभूति होती है तो उस वक्त हमारी उम्र और शरीर ढल चुका होता है और हम कुछ कर नहीं पाते हैं।

आज्ञाकारी और अनुशासित होने की इच्छा
इसी प्रकार अधिकांश लोग अपने बच्चों से आज्ञाकारी और अनुशासित होने की इच्छा करते हैं लेकिन वास्तविकता यह होती है कि जवानी के दिनों में अधिकांश युवक-युवतियों ने अपने अभिभावकांे अर्थात माता-पिता का दिल दुखाया होता है या उनकी सेवा नहीं की होती है।

टिक्….टिक् करती घड़ी के कांटे
इसी प्रकार हमारे पुराण, कथाओं और सनातन धर्म (हर धर्म का नियम है) में कहा गया है कि 60 वर्ष की उम्र होते-होते इंसान अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभा चुका होता है। बच्चे स्वयं बड़े होकर अपने पैरों पर खड़े हो चुके होते हैं। उनका विवाह किया जा चुका होता है। अर्थात इस उम्र को पूरा करने के बाद इंसान को देश, समाज और दूसरों की मदद के कार्य में लग जाना चाहिये और जो अनुभव उसने अपने बीते समय में लिया होता है उसके सहारे ही दूसरों की भलाई में जुट जाए ना कि बुढ़ापे की मार झेले और बंद कमरों में अकेला पड़ा रहे या बीमारी की अवस्था में पहुंच जाए और अपने बच्चों या दूसरों से मदद की अपेक्षा करे। 60 वर्ष की उम्र के बाद का यह वह समय अर्थात दौर होता है जब कभी भी मृत्यु हो सकती है। इस उम्र के बाद इंसान मृत्यु की ओर ही बढ़ता है। यह सत्य ठीक उसी तरह है जैसे टिक्….टिक् करती घड़ी के कांटे कई बार रूक जाते हैं और हम सेल अर्थात बेट्री डालकर समय चक्र को फिर चला देते हैं अर्थात दवाईयों के सहारे अपने स्वास्थ्य को ठीक करते हैं लेकिन एक दिन घड़ी के कांटे आगे बढ़ने का नाम ही नहीं लेते हैं और बैट्री भी अर्थात चिकित्सा या डायलिसिस भी काम करना बंद कर देते हैं।

शवयात्रा को नहीं देख पाते हैं
मुख्य बात यह भी है कि जैसे ही हम मृत्यु को प्राप्त करते हैं तो हम अपनी शवयात्रा को नहीं देख पाते हैं। हमें शमशान तक ले जाने वाले कितने लोग होते हैं यही संख्या सबसे अधिक मायने रखती है। अगर हजारों लोगों ने हमारी शवयात्रा में हिस्सा लिया होता है तो उसका अर्थ यही है कि हमने समाज और देश के लिए कुछ किया है। जिन्होंने परिवार, खानदान, समाज और देश के लिए कुछ किया होता है तो हर वर्ष उनका स्मरण किसी ना किसी तरह या रूप में किया जाता है। अगर चंद लोग ही शव यात्रा में शामिल होते हैं तो इसका अर्थ यही है कि हमने मात्र परिवार तक की चिंता की। लेकिन ऐसे भी लोगों के शव भी होते हैं जिन्हें कंधा देने वाला या शमशान तक पहुंचाने वाला नहीं होता है और वो अकाल और अज्ञात मौत बन जाते हैं। उन्हें मात्र फूंक दिया जाता है।

इस लेख का भावार्थ यही है कि हमारा शरीर और हमारी कार्यप्रणाली परिवार, मित्रों, समाज से होते हुए देश अर्थात देश के सर्वहारा वर्ग तक पहुंचनी चाहिये और इसी में मानव का कल्याण है।
(UPDATED ON 14TH MAY 2026)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button