’’मस्तिष्क” ही अच्छा-बुरा कराता है

इंसान कुछ ’अच्छा’ या ’बुरा’ नहीं करता है। अगर करता है तो वह कराने वाला ’’मस्तिष्क’’ है। जी हा! मस्तिष्क ही हर इंसान और जीव-जंतुओ से अच्छा और बुरा करवाता है और वह भी मात्र विचारों से। जैसे ही इंसान के मस्तिष्क में बुरा विचार आता है तो इंसान के शरीर के सारे अंग बुरे कर्म करवाने लगते हंै। इंसान के पैर गलत दिशा में चल पड़ते हैं। इंसान के हाथ., बुरे कर्म-शरीर के माध्यम से करने लगते हैं। अंक गणित की तरह इंसान के बुरे कर्म जैसे-जैसे बढ़ते जाते हैं तो वो भी एकत्रित होने लगते हैं। बुरे कर्म ही इंसान को विभिन्न तरह से नुकसान पहुंचाते हैं। जब ये कर्म नुकसान पहुंचाते है तब इंसान का ’’मस्तिष्क’’ फिर जागृत होकर इंसान को ’सावधान’ करता है। अर्थात मस्तिष्क इंसान को सचेत करता है कि तूने जो गलत कार्य किए हैं उसे यहीं रोक दें और किये गये गलत कार्य अथवा कार्यों का ’’प्रायश्चित ’’ कर। जैसे ही इंसान बुरे कर्म या कर्मों का प्रायश्चित करता है तो फिर ’मस्तिष्क’ इंसान के शरीर में सकारात्मकता पैदा करता है और इंसान के शरीर के अंग हाथ,नाक, कान और पैर सहित सभी इंद्रियां सक्रिय होकर इंसान को एक सभ्य इंसान बनाने के लिए सक्रिय होकर परिणाम देने लगती हैं।
मुख्य प्रश्न अब यह है कि आखिर वो कौन सी शक्ति है जो ’’मस्तिक’’ से ’’अच्छा या बुरा’’ कर्म कराती है…….?।
अब आईये! ’’मस्तिष्क’ के सकारात्मक रूप का वर्णन करते हैं। जब ’’मस्तिष्क’ इंसान के मस्तिष्क मंे सूक्ष्य और दृश्य-विहिन विचार पैदा करता है तो इंसान शिक्षा, कारोबार, नौकरी, समाज और देशसेवा में जुट जाता है। ’’मस्तिष्क’ में आने वाले विचार., विज्ञान के माध्यम से कुछ नया करने के विचार पैदा करता है। कल्पना कीजिए कि जब सब्जियों, अनाज, फल और फूल सम्बंधी सकारात्मक विचार अनादिकाल में इंसान के ’’मस्तिष्क’ में आए होेंगे तभी तो विभिन्न तरह की सब्जियों और अनाज को इंसान पैदा कर खाने लगा और उसके शरीर में ये आहार पहुंचने लगा। अर्थात मस्तिष्क ने ही शरीर के विकास में योगदान दिया है। इंसान एक वक्त कच्चे और मिट्टी के मकानों में रहता था क्योंकि उस वक्त ’’मस्तिष्क’ ने सीमेंट, ईंट या अन्य सामानों के निर्माण के विचार इंसान के ’’मस्तिष्क’ में उत्पन्न नहीं किए थे। करीब 50 साल से पहले घर में मिट्टी के चूल्हे पर भोजन पकता और तैयार होता था। उस वक्त एलपीजी गैस का आविष्कार नहीं हुआ था। लेकिन उस वक्त भी सकारात्मक विचारों ने ही ’’मस्तिष्क’ को सक्रिय किया और इंसान ने एलपीजी सहित अन्य आविष्कार किए जिनकी गिनती करना मुश्किल है और ये आविष्कार इंसानी ’’मस्तिष्क’ ही कर रहा है और करता रहेगा बस सोच और मानसिकता सकारात्मक हो।
अंत में, मृत्यु निश्चित है। मृत्यु के बाद अगर कोई चीज जीवित रहती है तो मृत हो चुके व्यक्ति के जीवनकाल के अच्छे और बुरे कार्य। मरने के बाद बुरे इंसान को भी बुरे विचारों वाला ’’मस्तिष्क’ बुरा कहता है। अर्थात अगर एक अपराधी से किसी दूसरे अपराधी के बुरे कार्य की चर्चा की जाए तो वह अपराधी भी बुरे कार्य को बुरा कहता है। इसी प्रकार अच्छे कार्य करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद परिवार और समाज तथा देश उन्हें याद रखता है और समय-समय पर उनका स्मरण करता है। जो भी व्यक्ति अच्छे कार्य कर मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसके परिवार को समाज और देश ’सम्मान’ की दृष्टि से देखता और चर्चा करता है। अच्छे विचारों वाले लोगों के कार्याें तथा आचरण के कारण ही पृथ्वी चल रही है। आईये! हम भी सकारात्मक ’’मस्तिष्क’ के सहारे अपना योगदान दें। लेखक -शेखर कपूर। 30TH OCTOBER 2026



