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“”पूछने और बताने में फर्क और बढ़ता तनाव””

-शेखर कपूर

आजकल अधिकांश परिवारों में युवक और युवतियां आजादी का अर्थ अपने-अपने तरीके से निकालने लगे हैं। शिक्षित होने के साथ ही वह स्वयं को आत्मनिर्भर मानने लगते हैं। उन्हें यह महसूस होता है कि उन्होंने जो कुछ अर्जित किया है स्वयं की मेहनत के बल पर किया है। इसका परिणाम यह निकला है कि ’पूछने और बताने’ का अर्थ निरर्थक या व्यर्थ होता जा रहा है। इसका परिणाम यह भी निकला है कि अधिकांश युवक और युवतियां सही रास्ते को चुनने में गलती कर देते हैं। जब निराशा या नकारात्मक या बुरा परिणाम मिलता है तो कई बार अपने माता-पिता को कौसते हैं तो कई बार स्वयं को अंधकार की ओर धकेल देते हैं।

’’पहले तो पूछने और बताने’’ में फर्क में को स्पष्ट करना जरूरी है। ’पूछना’ शब्द एक वाक्य होता है जिसमें युवक और युवतियां या परिवार के अन्य छोटे सदस्य अपने बड़ों अर्थात बुर्जुग या माता-पिता अथवा परिवार के जिम्मेदार व्यक्ति से पूछते हैं कि ’ मैं उस काम को कर लूं..?। अर्थात इस शब्द और उससे बने वाक्य में ’’अनुमति और आज्ञा’’ का भाव छिपा होता है। घर के जिस जिम्मेदार अथवा बुजुर्ग व्यक्ति से जब यह आज्ञा ली जाती है तो उसे अहसास होता है कि उसके बच्चे या परिवार के अन्य छोटे सदस्य उसे ’सम्मान और मान’ दे रहे हैं। इसका सकारात्मक परिणाम यह होता है कि एक तो परिवार के बीच संवाद और सामंजस्य बना रहता है तो बुजुर्ग या वरिष्ठ परिवार सदस्य अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर अनुमति अर्थात पूछने पर जबाव देता है। वह गलत और सही का फर्क समझाता है जिसका परिणाम यह होता है कि पारावारिक एकता बनी रहती है तथा पूछने पर संभावित खतरे या गलती से बचा जा सकता है।

अब आता है ’बताने का फर्क’। अधिकांश युवक और युवतियां अपने मन की बात अपने माता अर्थात माॅ को या बहन को ही बताते हैं। अर्थात वहां पर मन की बात कह दी जाती है लेकिन संभावित गलती या संकट का उन्हें उत्तर नहीं मिल पाता है। इसी प्रकार बताने का अर्थ यह भी होता है कि जो युवक और युवती अपनी बात बता रहे हैं उसमें उनका निर्णय होता है। उदाहरण के तौर पर ’’मैं आज देर से घर लौटूंगा, मैं आज खाना नहीं खाउंगा, मैं आज सिनेमा देखने जा रहा हॅू, मैने आज मित्रों के साथ पार्टी रखी है, मैंने सम्बंधित काॅलेज में एडमिशन का निर्णय लिया है, मैं उस युवती या युवक से प्रेम करता हॅू और उसी से शादी करूंगा या करूंगी। यहां पर यह बताना जरूरी है कि माॅ और बहन को जब यह निर्णय बताया जाता है तो उनकी ओर से अधिकांशतः सावधानी और सुरक्षा की बात नहीं कही जाती है और ना ही भविष्य के किसी आसन्न संकट के लिए चेताया जाता है। जबकि पिता या जिम्मेदार व्यक्ति के पास इसका उत्तर होता है लेकिन सवाल यही उठता है कि उससे या उनसे पूछा ही नहीं गया अर्थात अनुमति ही नहीं ली गई।

हम इस विषय को आज के संदर्भ में इसलिए उठा रहे हैं क्योंकि अधिकांश परिवारों में पिता और पुत्र या परिवार के जिम्मेदार सदस्य के बीच इसी ’पूछने और बताने’ जैसे शब्द या वाक्य के आधार पर तनाव बढ़ता जा रहा है। यह सत्य है कि सभी बालिग युवक और युवतियों को अपने मन के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार है लेकिन जब वह पारावारिक स्तर पर रह रहे हैं तो उन्हें इस शब्द और वाक्य की महत्ता समझ लेनी जरूरी है। अगर दूर भी रह रहे हैं तो वर्तमान में आधुनिक संचार प्रणाली के माध्यम से उन्हें अवगत कराकर उनकी रायशुमारी या अनुमति ली जा सकती है। ’’आज्ञा’’ शब्द में मधुर और अनुशासित जीवन का भाव छिपा है। इस शब्द और वाक्य में पारावारिक एकता छिपी है। इस शब्द में युवक और युवतियों के भविष्य का सार छिपा है, बस समझने की जरूरत है।

(updated on 10th May 2026)

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