-कितने बच्चे माता-पिता के लिए प्रार्थना करते हैं..?
विश्व का कोई भी धर्म हो, हर धर्म में ’’प्रार्थना’’ का सर्वाधिक महत्व है। हिंदू व्यक्ति ईश्वर की मूर्तियों के समक्ष खड़ा होकर या बैठकर ’’प्रार्थना’’ करता है। इस्लाम में नमाज पढ़कर इबादत की जाती है तो सिख धर्म में भी गुरू ग्रंथ साहिब, गुरू दरबार तथा सिख गुरूओं के समक्ष ’’प्रार्थना’’ की जाती है। क्रिश्चियन धर्म में भी चर्च में एकत्रित होकर या घर में प्रभु यिशु के चित्र के समक्ष खड़ा होकर ’’प्रार्थना’’ की जाती है। विश्व के अन्य धर्मों में भी सम्बंधित समुदाय के मानने वाले लोग अपने-अपने तरीके से उस अदृश्य शक्ति को स्मरण अर्थात ’’प्रार्थना’’ करते हैं जिनको वह मानते हैं। ’’प्रार्थना’’ में आखिर परिवार के प्रमुख व्यक्ति, माता-पिता और अभिभावक अपने-अपने परमात्मा से आखिर ’’क्या’’ ’’प्रार्थना’’ करते हैं…?। कभी इस विषय पर जानने की कोशिश नहीं की गई होगी।
जी हाॅ! आज हम उस विषय को बताना चाहते हैं कि परिवार के नेतृत्वकर्ता अर्थात माता-पिता या अभिभावक अपनी प्रार्थना में सांसारिक भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की प्रार्थना तो अपने-अपने इष्ट देवों से करते हैं लेकिन उसमें एक प्रमुख प्रार्थना होती है ’’बच्चों का विकास, उनका स्वस्थ और बाधा रहित जीवन’’ की ’’प्रार्थना’’।
मैं, दावे के साथ कह सकता हॅू कि हर माता-पिता या अभिभावक की प्रार्थना में ’’अपने बच्चों के विकास और उन्नति तथा उनके स्वस्थ्य जीवन’’ की प्रार्थना प्रमुख विषय होती है। इस ’’प्रार्थना’’ के साथ माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य और विकास के लिए प्रयत्न और कार्य भी करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि सम्बंधित बच्चों के जीवन के विकास, उन्नति और स्वस्थ्य जीवन में वो अदृश्य शक्तियां अपना कार्य करती हैं। परिणाम यह होता है कि सम्बंधित बच्चे., सम्बंधित माता-पिता के जीवित रहते जब उन्नति करते हैं तो वहीं माता-पिता अपने जीवनकाल में प्रफुल्लित और उत्साह से भरे होते हैं। वो हमेशा यही कहते हैं कि उनका जीवन सफल हो गया या या कहावत का उपयोग करते हैं कि उन्होंने ’’गंगा स्नान कर लिया’’।
अब आईये! बात करते हैं समझदार, विवाहित और नौकरी या कारोबार कर रहे बच्चों द्वारा अपने-अपने धर्म के अनुसार की जाने वाली ’’पूजा या प्रार्थना’’ की। जब यही बच्चे भगवान के समक्ष ’’प्रार्थना’’ करते हैं तो उन बच्चों की प्रार्थना में शायद ही माता-पिता के बुढ़ापे में स्वस्थ्य रहने और उनकी सेवा करने की ’’प्रार्थना’’ होती है। यही समझदार और विवाहित बच्चे स्वस्थ और प्रसन्न रहते हुए अपने जीवनकाल में स्वयं की खुशी के लिए सब कुछ करते हैं लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उन समझदार बच्चों की संख्या कम होती जा रही है जो अपने माता-पिता के बुढ़ापे की लाठी अर्थात सहारा बनते हों। बहुत कम समझदार बच्चे होंगे जो अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा अपने माता-पिता को देते होंगे। बहुत कम बच्चों की संख्या ऐसी होगी जब वह अपने पवित्र स्थलों या पूजा घर में ’’प्रार्थना’’ करते होंगे तो उस वक्त उनके मस्तिष्क में माता-पिता के स्वस्थ्य जीवन का भी विषय होता हो। बुढ़ापे में जब माता-पिता का शरीर कमजोर हो जाता है अथवा कोई बीमारी घेर लेती है तो बहुत कम बच्चे ऐसे होंगे जो उन्हें प्रसन्न रखते हुए उन पर विशेष ध्यान देते होंगे। बल्कि होता यह है कि बुढ़ापे में बूढ़ा व्यक्ति मौत का इंतजार करता रहता है। वह अवसाद में चला जाता है और फिर वह अंतिम सांस ले लेता है। हमने यह तो सुना और देखा है कि एक बच्चे के बीमार रहने और शिक्षा के लिए माता-पिता सब कुछ दांव पर लगा देते हैं…..वे धन ना होने पर संपत्ति बेच देते हैं…लोन लेते हैं लेकिन यह नहीं सुना कि अपने माता-पिता के बुढ़ापे में उन्हें स्वस्थ्य और प्रसन्न रखने के लिए बच्चों द्वारा कुछ ऐसे ही प्रयास किए गए हों।
हर बच्चा जो एक उम्र बाद युवा या युवती बन चुका है इस विषय पर निश्चित रूप से विचार करे तो भारतीय संस्कृति में परिवार की एकता लगातार मजबूत होती रहेगी। मेरे इस विषय में कुछ स्तर पर विरोधाभास हो सकता है लेकिन जो कटु सत्य है उस पर बच्चों से युवा और जवान होती पीढ़ी को विचार करना होगा क्योंकि एक या दो दशक बाद उन्हें भी बुढ़ापे की तरफ बढ़ना है।’- लेखक शेखर कपूर 17 अक्टूबर 2026