articles

आत्मा की आवाज हमेशा ’’सावधान’’ करती है……!

-लेखक-
-शेखर कपूर-

हर इंसान के शरीर में जो ’आत्मा’ निवास करती है वह हमेशा इंसान को ’’अच्छाई-बुराई’’ का अहसास कराती है। जैसे ही इंसान कोई बुराई करने की सोंचता है या बुरा कार्य करता है तुरंत मानव शरीर में मौजूद ’आत्मा’’ सक्रिय हो जाती है। तुरंत ही यह आत्मा कहती है कि ’’जो तू बुरा करने जा रहा है वह मत कर’’। लेकिन बुराई के साथ उस वक्त क्रोध, गुस्सा, आवेश या नकारात्मक भावना भी प्रबल होती है जो इंसान को रोक नहीं पाती और इंसान किसी को हानि पहुंचा देता है। उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति किसी को चोंट पहुंचाता है और दूसरे व्यक्ति के शरीर से रक्त निकलता है तो इंसान की ’’आत्मा’’ तुरंत सक्रिय होकर उसे कहती है तूने ’’बुरा’’ कर दिया। और चोंट पहुंचाने वाला सम्बंधित व्यक्ति डर कर भागता है….अपने लोगों से मुंह चुराता है….. कानून के डर से भागने लगता है। अर्थात ’आत्मा’ अपना काम कर रही होती है। चोर, उचक्के, डाकू, लुटेरे, बलात्कारी इसीलिए तो कानून के डर से भागते हैं क्योंकि उनकी ’’आत्मा’’ उन्हें यह आभास करा देती है कि ’’तूने’’ गलत कार्य किया है और तुझे इसका परिणाम भुगतना ही पड़ेगा।

इसी प्रकार जब कोई इंसान अच्छा कार्य कर रहा होता है जैसे दुर्घटना में कोई व्यक्ति घायल हो गया और उसे अन्य व्यक्ति अस्पताल ले जाता है….घायल व्यक्ति के परिवार को सूचित करता है और उस वक्त घायल व्यक्ति की मदद करता है तो मदद करने वाले व्यक्ति की ” आत्मा’’ तुरंत उसे आत्म संतुष्ठि की भावना से भर देती है। ’’आत्मा’’ खुद इंसान के मस्तिष्क को कहने लगती है ’’तूने अच्छा किया’’ और मदद करने वाला व्यक्ति हमेशा सामान्य, सहज और सह्दय दिखायी पड़ता है।

इसी प्रकार हमने समाज और देश में कई ऐसे व्यक्तियों को देखा और प्रतिदिन देखते हैं जो विभिन्न तरीके से बुराईयां करते हैं या बुरे अर्थात नकारात्मक कार्य करते हैं। जैसे मिलावट करने वाला, नकली पदार्थ बनाने वाला, रिश्वत लेने वाला, अत्याधिक दाम वसूलने वाला, चौथ वसूली करने वाला, ज्यादा मुनाफा कमाने की इच्छा के चलते अनाप-शनाप धन वसूलने वाले सहित कई बुरे और असामाजिक कार्य कई लोग करते हैं। उन्हें स्वयं यह पता होता या आभास होता है कि इस तरह के कृत्य करना बुरा है और इसके परिणाम भी नकारात्मक या बुरे होंगे तो इस प्रवृत्ति के लोग ’पश्चाताप’ का सहारा लेते हैं। ’पश्चाताप’ का आभास भी ’’आत्मा’’ कराती है। इस ’पश्चाताप’ के चलते वही बुरे या नकारात्मक कार्य करने वाला व्यक्ति अपने-अपने इष्ट देवों अर्थात ’भगवान, अल्लाह, वाहे गुरू, क्राइस्ट या अन्य’ को प्रसन्न करने के लिए कुछ राशि दान में देता है। वह सामाजिक कार्यों में अपनी आय का कुछ हिस्सा दान देता है या देता रहता है। वह कई गरीबों की मदद करता है,,, कई गरीब लड़कियों की शादी करवाने में आर्थिक मदद करता है, धार्मिक यात्रा पर जाता है, भोजन के भंडारे लगवाता है जैसे कई सामाजिक, धार्मिक और राष्ट्रीय तथा पवित्र कार्यों में आर्थिक मदद करता है जिससे उसे स्वयं अर्थात उसकी ’आत्मा’ उसे महसूस कराती है कि उसने ’पश्चाताप’ कर अच्छा कार्य किया है।

यह भी सही है कि ’पश्चाताप’ के बावजूद उसके द्वारा किए गए बुरे कार्य का परिणाम उसे भुगतना ही पड़ता है- हाॅ इतना अवश्य होता है कि जो परिणाम उसे ईश्वरीय विधान के अनुसार भुगतने पड़ते हैं उनमें ’’कमी अर्थात नरमी ’’ आ जाती है….अर्थात बुरा समय या परिणाम कम प्रभावी होता है। लेकिन यह सत्य है कि उसे परिणाम तो भुगतना ही पड़ता है जैसे 100 प्रतिशत की जगत 40 या 50 प्रतिशत। जैसा कि कानून में होता है। अपराधी जेल में रहते हुए सजा तो भुगतता है लेकिन जेल में रहते हुए जब अच्छे कार्य करता है तो जेल प्रशासन अर्थात सरकार उसकी सजा को कम कर देती है।

——-उपरोक्त उदाहरण मनुष्य जीवन में घटित घटनाओं के आधार पर दिये गए हैं। इनका वास्तविकता से कितना सम्बंध है यह जनजीवन में देखा जा सकता है——–—-

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button