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घर एक मंदिर क्यों कहा जाता है?

भारतीय संस्कृति में घर को एक मंदिर की उपमा से अलकृंत क्यों किया गया है…?। इसका शाब्दिक और सांस्कृतिक अर्थ होने के साथ धार्मिक अर्थ भी है। सर्वप्रथम तो यह समझने की जरूरत है कि ’घर’ किससे बनता है? जी हां! घर बनता है परिवार से और जिस परिवार में माता-पिता की उपस्थिति रहती है या उनकी स्मृति होती है वही ’’घर’’ कहलाता है। कुछ लोगों की नजर में ’घरवाली’ अर्थात पत्नि से एक घर की उपमा की गई है जो कि माता-पिता के बाद ही प्रतिनिधित्व करती है।

भारतीय संस्कृति के तहत माता-पिता को भगवान की श्रेणी में इसलिए रखा गया है क्योंकि एक माता और पिता हर परिवार में ईश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके आर्शीवाद हमेशा परिवार को एकता की श्रेणी में रखते हैं तो वहीं जिस परिवार में माता-पिता का सम्मान होता है वह परिवार सुखद और समृद्धि से भरपूर होता है। जहां माता-पिता की स्मृति शेष रह जाती है वहां पर ’’स्त्री’’ जो कि पत्नि हो सकती है और बहन भी या बेटियां भी उनसे भी घर की मर्यादा और शोभा बनती और बढ़ती है। इतना ही नहीं जिस परिवार में माता-पिता या स्त्री को सम्मान देने के साथ ही उनकी बातों को वरियता दी जाती है वहीं पर ईश्वर भी विराजते हैं। अब यह जरूरी हो जाता है कि जब परिवार में माता-पिता या स्त्री मौजूद है तो वहां स्वच्छता और सौंदर्यता तो होनी ही चाहिये जैसे भगवान के मंदिर में होती है।

ध्यान यह रहे कि बिना माता-पिता और किसी स्त्री की मौजूदगी के बिना कोई भी ’’घर’’., ’’घर’’ नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार ईश्वर ने माता-पिता के रूप में अपने प्रतिनिधि की नियुक्ति की होती है जो घर का संचालन करते हैं। इसलिए जरूरी है कि घर की मर्यादा को बनाये रखने के लिए माता-पिता को सर्वप्रथम महत्व दिया जाए और बाद में या उनकी अनुपस्थिति में परिवार की ’स्त्री’ को जो घर का संचालन करती हैं।

भारतीय संस्कृति में तो कहा गया है कि अगर मंदिर में पूजा ना करते हो या मंदिर अथवा धार्मिक स्थान पर नहीं जाते हो तो चलेगा लेकिन माता-पिता की सेवा जिस घर में होती है वह मंदिर से कम नहीं होता है और ईश्वर की मौजूदगी वहां सदा रहती है। जो अपने माता-पिता की सेवा या सम्मान नहीं करते हैं उस घर में हमेशा दुखः और दरिद्रता बनी रहती है। वहां शारीरिक रोग हमेशा बने रहते हैं। माता-पिता का आर्शीवाद जिनके साथ रहता है वह वर्तमान में ही सुखों का आनंद लेते हैं।


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