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श्राद्ध पक्ष

श्राद्ध पक्ष का महत्व मृत पूर्वजों (पितरों) की आत्मा की शांति, उन्हें तृप्त करने और उनके प्रति श्रद्धा व कृतज्ञता व्यक्त करने में है, जिसके लिए तर्पण, पिंडदान और दान किया जाता है; इससे पितरों का आशीर्वाद मिलता है, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है, और परिवार में सुख-समृद्धि, धन व लंबी आयु आती है, साथ ही पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है। यह पितृलोक के द्वार खुलने का समय होता है, जब पितर धरती पर आते हैं और इन कर्मों से उन्हें उच्च लोकों की यात्रा में सहायता मिलती है।

श्राद्ध हिन्दू समाज में आवश्यक रूप से किया जाने वाला कर्म कांड है। हिन्दू महीने भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन श्राद्ध पक्ष शुरू होते हैं। श्राद्धपक्ष के 16 दिन होने का कारण ये माना जाता है कि हिन्दू समाज मे यदि किसी की मौत होती है तो वह इन 16 तिथियों में ही होती है। इन तिथियों के अनुसार ही पितरों का श्राद्ध श्राद्धपक्ष के दौरान उसी तिथि पर कर दिया जाता है। आज लगभग हर हिन्दू परिवार में श्राद्ध किया जाता है।।

श्राद्ध के विषय मे एक कथा का वर्णन मिलता है जिसमे एक रुची नाम का ब्रह्मचारी साधक वेदों के अनुसार साधना कर रहा था। वह जब 40 वर्ष का हुआ तब उसे अपने चार पूर्वज जो मनमाना आचरण व शास्त्र विरुद्ध साधना करके पितर बने हुए थे तथा कष्ट भोग रहे थे, वे दिखाई दिए। पितरों ने उससे श्राद्ध की इच्छा जताई।।इस पर रूची ऋषि बोले कि वेद में क्रिया या कर्म काण्ड मार्ग (श्राद्ध, पिण्ड भरवाना आदि) को मूर्खों की साधना कहा है। फिर आप मुझे क्यों उस गलत (शास्त्रविधि रहित) रास्ते पर लगा रहे हो।

इस पर पितरों ने कहा कि बेटा आपकी बात सत्य है कि वेदों में पितर पूजा, भूत पूजा के साथ साथ देवी देवताओं की पूजा को भी अविद्या की संज्ञा दी है। फिर भी पितरों ने रूचि ऋषि को विवश किया एवं विवाह करने के उपरांत श्राद्ध के लिए प्रेरित करके उसकी भक्ति का सर्वनाश किया।
( इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं।)


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