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पारसी समुदाय में अंतिम संस्कार

पारसी समुदाय में अंतिम संस्कार को दोखमेनाशिनी (Dokhmenashini) कहते हैं, जिसमें शव को जलाया, दफनाया या पानी में नहीं डाला जाता, बल्कि एक गोलाकार इमारत ‘टावर ऑफ साइलेंस’ (दखमा) में रखकर खुले आसमान के नीचे छोड़ दिया जाता है, ताकि गिद्ध, चील और कौवे उसे खा सकें; यह प्रकृति को शरीर लौटाने और पवित्र तत्वों (अग्नि, पृथ्वी, जल) को दूषित न करने की मान्यता पर आधारित है, जहाँ शव के मांस को पक्षी खा जाते हैं और हड्डियाँ सूर्य की रोशनी से नष्ट हो जाती हैं। पारसी अंतिम संस्कार के इस तरीके को ‘दोखमेनाशिनी’ कहा जाता है।

पारसी धर्म (Parsi Funeral Rituals Rules) में दोखमेनाशिनी की परम्परा सदियों से चली आ रही है। जिसमें व्यक्ति के मरने के बाद उनके शव को प्रकृति की गोद में छोड़ दिया जाता है। इसे लेकर पारसी अनुयायियों का यह मानना है कि शव को जलाने से या फिर दफनाने से प्रकृति को नुकसान होता है, अर्थात प्रकृति को नुकसान पहुंचता है। वहीं पारसी धर्म के अनुसार, अंतिम संस्कार करने से चील और गिद्ध जैसे पक्षियों का पेट भी भरता है और प्रकृति को कोई नुकसान नहीं होता।

भारत में पहला ‘टॉवर ऑफ साइलेंस’ कोलकाता में सन् 1822 में बना था। पारसी धर्म में माना गया है कि यदि शव को जलाया जाए तो इससे वायु प्रदूषण बढ़ सकता है, वहीं शवों को नदी में बहाया जाए तोतो इससे पानी प्रदूषित की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए पारसी समुदाय अंतिम संस्कार के लिए यह खास तरीका अपनाया जाता है।

अब पारसी धर्म के अंतिम संस्कार के लिए ‘टॉवर ऑफ साइलेंस’ में शवों को रखने का चलन कम हुआ है। चलन हालांकि अब कम हो गया है। क्योंकि इस टॉवर के पास अब आबादी बढ़ने लगी है, तो ऐसे में यहां शव को प्राकृतिक तौर पर डिकम्पोज़्ड नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि अब पारसी धर्म में भी शवों को जलाया या फिर दफनाया जाने लगा है।

हालांकि, पिछले कुछ समय से पारसी धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या में गिरावट आई है। दुनियाभर में करीब 2 लाख पारसी ही बाकी हैं। वर्ल्ड पॉपुलिशेन रिव्यू की मानें तो इनकी संख्या अब सवा लाख से ज्यादा नहीं है। भारत के अलावा ईरान, अमेरिका, इराक, उजबेकिस्तान और कनाडा में भी पारसी धर्म के लोग बसे हुए हैं।

( इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं।)

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