–पृथ्वी रूपी घर में आप ’अतिथि’ अर्थात ’मेहमान’ ही हैं–

मेहमानों के बारे में कहा जाता है कि वह ’अतिथि’ होता है। वर्तमान समय में ’अतिथि’ शब्द की व्याख्या बदल गई है। 1980 के दशक से पहले तक देश में ना तो फोन होते थे और ना ही मोबाइल। एक मात्र सहारा चिट्ठी का होता था। इंसान अपने परिचितों और रिश्तेदारों को पत्र लिखकर उनके घर अर्थात निवास या शहर में आने की सूचना दिया करता था। कई बार यह पत्र देर से पहुंचता था या फिर नहीं भी या नहीं भी लिखा जाता था। जैसे ही सम्बंधित इंसान अपने परिचितों या रिश्तेदारों के घर पर पहुंचता था तो वे भौचक्के या आश्चर्यचकित रह जाते थे और यही कहते थे बिना बताए आ गए ’अतिथि’ बनकर। अधिकांश रिश्तेदारों या परिचितों या फिर भारतीय संस्कृति केे समझदार लोगों की नजर में वह ’भगवान’ से कम नहीं होते थे। उनका स्वागत किया जाता था। इन अतिथियों को भगवान का दर्जा इसलिए भी दिया जाता था क्योंकि उनके आगमन से सम्बंधित घर में खुशियां आती थीं। कुछ समय का हंसना-बोलना और आमोद-प्रमोद होता था और। कुछ समय बाद वो विदा हो जाते थे।
हमने इस कहावत को पृथ्वी और इंसान के संदर्भ में इसलिए रखा है क्योंकि पृथ्वी रूपी घर जो एक ग्रह है, में इंसान एक ’अतिथि’ के अलावा कुछ नहीं है। जब वह एक शिशु के रूप में परिवार और घर के माध्यम से पृथ्वी पर प्रवेश करता है तो उसे अपने इस पृथ्वी रूपी घर से एक दिन वापस ईश्वर के दरबार में जाना ही होता है। अर्थात पृथ्वी पर जन्म लेने वाला हर इंसान एक ’अतिथि’ है। भारतीय संस्कृति के अनुसार इस अतिथि को भगवान का प्रतिनिधि माना जाता रहा है इसीलिए उसका हमेशा यह कर्तव्य रहा है कि वह पृथ्वी पर रहने वाले इंसानों, जीव जंतुओं और जानवरों का बेहतर तरीके से ख्याल रखे। अपना कर्तव्य और जिम्मेदारी निभाए और जो ज्ञान और कला के साथ दक्षता उसके पास है वह दूसरों को देकर अपने घर अर्थात पृथ्वी से वापस ब्रह्मलोक में चला जाए।
चूंकि कोई भी इंसान अपने घर अर्थात पृथ्वी से विभिन्न तरह के ’’लोभ और लालच’ के चलते वापस नहीं जाना चाहता है इसीलिए शास्त्रों के अनुसार उसे यमराज लेने आते हैं और उसकी ’’आत्मा’’ को वापस लेकर चले जाते हैं। सिर्फ रह जाता है तो मात्र शव अर्थात मृत काया अर्थात शरीर। इंसान के पृथ्वी से जाने के बाद रिश्तेदार या परिचित उस मृत व्यक्ति के जीवंतकाल में किए गए कार्यों, उपलब्धियों या बुरे कार्यों की चर्चा करते हैं।
उसके अच्छे और बुरे या नकारात्मक कार्यो के कारण पृथ्वी से प्रस्थित किए गए व्यक्ति की चर्चा अनंतकाल तक बनी रहती है। जैसे रावण और कंस की चर्चा उनके बुरे कार्यों के कारण हमेशा होती रही है उसी प्रकार भगवान श्रीराम, रानी लक्ष्मीबाई, ईश्वरचंद विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद सहित अनगिनत हस्तियों की चर्चा हमेशा होती रहेगी।
ध्यान देने की बात यह है कि जिन्हें हम भगवान मानते हैं वह भी एक समय इंसान थे। उनके अच्छे कार्यों के कारण ही लोग उनकी पूजा करने लगे। इसके अतिरिक्त समाज और देश के प्रति विभिन्न रूपों में जिम्मेदारी निभाने वाली हस्तियों जैसे मदर टैरेसा, टाटा, बिड़ला तथा धीरूभाई अंबानी की चर्चा हमेशा की जाती रहेगी।
आईये! हम सभी अपने जीवंत काल में ’अतिथि’ शब्द की महत्ता को समझें और ’’पृथ्वी रूपी घर’’ में रहते हुए अपनी जिम्मेदारियांे और कर्तव्य को देश सेवा, मानव सेवा, जीव जंतु तथा जानवरों की सेवा में लगाएं। जो भी धन और संपत्ति अर्जित करें उसमें ईमानदारी का भाव हो।
क्योंकि जो लोग समाज और देश के प्रति जिम्मेदारी ना निभाकर गलत तरीके से धन और चाटुकारिता रूपी प्रशंसा अर्जित करते हैं उसका दुष्परिणाम उनकी भावी पीढ़ी को भुगतना पड़ता है। कम शब्दों में दुर्घटना और बीमारी में मौत इसके शाश्वत उदाहरण हैं। वर्तमान में कई ऐसे दुष्टजन जीवित हैं जो अपने बुरे परिणाम इसी लोक में विभिन्न रूपों में भुगत रहे हैं। इस लोक से जिनकी विदायी सुखद और शांत भाव से होती उसके पीछे उनके यशस्वी और नेक कार्य ही होते हैं जिसका लाभांश उनकी वर्तमान और भावी पीढ़ी को मिलता रहता है।
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