बड़ी हस्तियां दान पुण्य क्यों करती हैं, कारण कभी जाना है

बड़ी हस्तियां दान-पुण्य कई कारणों से करती हैं, जिनमें धार्मिक विश्वास (पुण्य कमाना, सौभाग्य बढ़ाना), सामाजिक जिम्मेदारी (समाज कल्याण), अपनी छवि सुधारना, और परोपकार की भावना शामिल है, हालांकि, दान का असली उद्देश्य निस्वार्थ और लोक कल्याण होना चाहिए, जैसे महर्षि दधीचि ने धर्म और समाज के लिए अपनी हड्डियाँ दान की थीं, जो त्याग और परोपकार का सर्वोच्च उदाहरण है।
हमारे देश में हर दिन, हर माह और हर वर्ष सामान्य व्यक्ति से लेकर धनाड्य व्यक्ति अपने कमाई का एक हिस्सा दान और पुण्य के रूप में विभिन्न अवसरों पर करता है। इसका उद्देश्य यही होता है कि आय का कुछ हिस्सा ईश्वर के नाम पर या जरूरतमंदों की मदद के लिए किया जाए। हमारे देश में हजारों ऐसे लोग हैं जो विभिन्न मंदिरों और धर्मालयों में एक रूपये से लेकर लाखों रूपये और स्वर्ण आभूषण से लेकर अनेकानेक वस्तुओं का दान करते रहते हैं। देश के विभिन्न मंदिरों में अरबों रूपये का स्वर्ण और नगद धनराशि समय-समय पर मिलती रहती है। हाल ही में रिलायंस ग्रुप के चेयरमेन अंबानी परिवार ने करोड़ों रूपये का दान विभिन्न मंदिरों के प्रोजेक्ट एवं योजनाओं के लिए किया। एक विशाल धनराशि के दान में दिये जाने का सर्व समाज पर असर पड़ता है और व्यक्ति की हैसियत भी आंकी जाती है।
दान-पुण्य करने के मुख्य कारण:
धार्मिक मान्यता: भारतीय संस्कृति में दान को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। यह माना जाता है कि दान करने से पाप धुलते हैं, पुण्य मिलता है, और जीवन में सौभाग्य आता है, जैसे ऊर्जा का रूपांतरण होता है।
परोपकार और सामाजिक उत्तरदायित्व: कई हस्तियाँ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझती हैं और जरूरतमंदों की मदद करने, शिक्षा, स्वास्थ्य या अन्य सामाजिक कार्यों के लिए दान करती हैं।
छवि और प्रतिष्ठा: दान-पुण्य करने से व्यक्ति की सामाजिक छवि सुधरती है और लोग उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। यह उनकी ब्रांडिंग का भी हिस्सा हो सकता है।
आंतरिक संतुष्टि: दूसरों की मदद करने से मिलने वाली खुशी और आत्मिक शांति भी एक बड़ा कारण होती है।
नैतिक और आध्यात्मिक कारण: कुछ लोग इसे अपने जीवन का उद्देश्य मानते हैं, जैसे महर्षि दधीचि, जिन्होंने धर्म और लोक कल्याण के लिए निस्वार्थ भाव से अपना शरीर दान कर दिया, जो भारतीय संस्कृति में त्याग का प्रतीक है।
महर्षि दधीचि का उदाहरण:
दधीचि ऋषि ने देवताओं की मदद के लिए अपनी हड्डियाँ दान कीं ताकि उनसे बने वज्र से वृत्रासुर राक्षस का वध हो सके, जो धर्म की रक्षा के लिए एक महान त्याग था, न कि किसी स्वार्थ के लिए।
ऐसे ही महान परोपकारी पुरुषो में महर्षि दधीचि का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। महर्षि दधीचि बड़े ज्ञानी थे। उनकी विद्वता की प्रसिद्धि देश के कोने – कोने तक फैली थी। दूर – दूर से विद्यार्थी उनके यहाँ विद्या अध्ययन के लिए आते थे। वे सज्जन, दयालु व उदार थे तथा सभी से प्रेम का व्यवहार करते थे।
महर्षि दधीचि नैमिषारण्य सीतापुर, उत्तर प्रदेश के घंने जंगलो के मध्य आश्रम बना कर रहते थे। उन्ही दिनों देवताओ और असुरो में लड़ाई छिड़ गयी। देवता धर्म का राज्य बनाये रखने का प्रयास कर रहे थे, जिससे लोगो की भलाई व हित होता रहे। जबकि असुरो के कार्य व व्यवहार ठीक नहीं थे. वे पापाचारी थे। लोगो को तरह–तरह से सताया करते थे।
वह अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए देवताओ से लड़ रहे थे। देवताओ को इससे बड़ी चिंता हुई। देवताओ के हार जाने का अर्थ था असुरो का राज स्थापित हो जाना। वह पूरी शक्ति से लड़ाई लड़ रहे थे। बहुत दिनों से यह लड़ाई चल रही थी। देवताओ ने असुरो को हराने के अनेक प्रयत्न किये किन्तु सफल नहीं हुए।
देवलोक पर वृत्रासुर राक्षस का अधिकार हो गया था। उन्होंने देवताओं को खदेड़ दिया। वह हर तरीके से देवताओं और जनता को प्रताड़ित करने लगा। दिन ब दिन उसके अत्याचार बढ़ रहे थे। अब देवराज इंद्र को अपने राज्य को बचाने की चिंता सता रही थी। वृत्रासुर का वध करना उनके लिए आसान कार्य नही थे। वे पहले से उसकी शक्ति से परिचित थे। अतः उन्होंने महर्षि दधीची के पास जाना ही उपयुक्त समझा।
जब वे ऋषि की कुटिया में पहुचे तो दधीची ने देवराज का आदर सत्कार किया और उनके आने का कारण पूछा। तब उन्होंने अपनी सम्पूर्ण व्यथा ऋषि को बताई। इस पर दधिची बोले महाराज में देव्राज्य एवं देवताओं की किस तरह मदद कर सकता हूँ। इस पर इंद्र ने उन्हें सारी विधि बताई तथा उनसे अपनी हड्डियों का दान माँगा।
महर्षि ने बिना कोई सवाल किये अपनी देह त्याग कर देवताओं की मदद करने की बात पर राजी हो गये। उसी समय उन्होंने समाधि मुद्रा में ध्यान लगाया और अपनी देह का त्याग कर दिया। संयोगवश उस समय उनकी पत्नी वहा नही थी। अब देवताओं के सामने सबसे बड़ी मुसीबत यह थी कि ऋषि के शरीर की चमड़ी और मांस कैसे हटाकर वे हड्डियाँ प्राप्त करे।
ऋषि की एक प्रिय कामधेनु गाय थी, देवताओं के आग्रह पर कामधेनु ने इस कार्य को करने का बीड़ा उठाया। गाय ने अपनी जीभ से महर्षि को चाट चाटकर उनका सारा मांस अलग कर दिया। अब केवल हड्डियों का ढांचा ही बचा था, जिनकी देवताओं को आवश्यकता थी।
आज भी इस ऋषि का वंश दाधीच कहलाता है।
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