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पगड़ी रस्म


पगड़ी रस्म मुख्य रूप से परिवार के सबसे बड़े पुरुष सदस्य की मृत्यु के बाद, परिवार के मुखिया के रूप में नई जिम्मेदारी लेने वाले अगले वरिष्ठ पुरुष सदस्य (आमतौर पर मृतक का बेटा या भाई) को सम्मान और अधिकार सौंपने के लिए की जाती है, जो मृतक से परिवार के मान-सम्मान और कल्याण की जिम्मेदारी हस्तांतरित करने का प्रतीक है; यह उत्तर भारत में, खासकर हिंदू और सिख समुदायों में, शोक समारोह (चौथा या तेरहवीं) के दौरान होती है।

पगड़ी रस्म करने के मुख्य कारण:
जिम्मेदारी का हस्तांतरण (Responsibility Transfer): यह रस्म दर्शाती है कि परिवार के मुखिया की जिम्मेदारियाँ अब परिवार के अगले वरिष्ठ पुरुष सदस्य (जो मुखाग्नि देता है) पर आ गई हैं।
सम्मान और नेतृत्व (Honor and Leadership): पगड़ी सम्मान और नेतृत्व का प्रतीक है; इसे बांधकर नए मुखिया को परिवार के मान-सम्मान और कल्याण की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है।
शोक से उबरना (Overcoming Grief): यह रस्म परिवार को शोक से बाहर निकलने और नई व्यवस्था के साथ आगे बढ़ने में मदद करती है, क्योंकि यह एक तरह का औपचारिक उत्सव है जो परिवार को एकजुट करता है।
सामाजिक मान्यता (Social Recognition): यह परिवार के नए मुखिया को समाज में औपचारिक रूप से स्थापित करती है।
यह कैसे की जाती है?
यह रस्म आमतौर पर अंतिम संस्कार के चौथे दिन या तेहरवीं (13वें दिन) पर होती है।
परिवार का सबसे बड़ा जीवित पुरुष सदस्य इस रस्म में भाग लेता है।
अक्सर, परिवार का कोई अन्य वरिष्ठ सदस्य या परिवार का कोई खास व्यक्ति सिर पर पगड़ी बाँधता है।
इस दिन समाज के लोग आते हैं और परिवार को आर्थिक सहयोग (लिफाफे में पैसे देकर) और समर्थन देते हैं।
संक्षेप में, पगड़ी रस्म शोक के समय परिवार के मुखिया को बदलने, नई जिम्मेदारी सौंपने और परिवार को सम्मानपूर्वक आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण सामाजिक और पारिवारिक अनुष्ठान है।

बेटे नहीं बेटी के माथे पर पगड़ी-ज्योति माथुर

भारत में पगड़ी की रस्म से बेटियों को परे रखा जाता है. रस्म है कि पिता के अवसान के बाद पुत्र ही पिता की पगड़ी धारण करता है. लेकिन जयपुर की ज्योति माथुर ने पिता के निधन के बाद पगड़ी की रस्म ऐसे सम्पन्न की जैसे कोई बेटा करता है.

ज्योति ने पिता की पगड़ी अपने सिर बाँध बदलाव की इबारत लिखी है. ज्योति कहती हैं –“मेरे पिता ने हमेशा मुझे बेटे से भी ज्यादा महत्व दिया.उन्होंने बेटी बेटो में कोई फर्क नहीं किया. मगर उनके निधन के बाद पगड़ी का सवाल आया तो मुझे लगा मेरे दिवगंत पिता की ख्वाहिश पूरी होगी, मैं ही पगड़ी की रस्म अदा करुँगी.ये सभी बेटियों के हको का सम्मान है”

जयपुर के महेश नगर में धार्मिक विधि-विधान और मंत्रो के बीच रस्मो रिवाज के अंधेरो से निकली ज्योति यूँ प्रकट हुई जैसे वो बेटियों के लिए रोशनी लेकर आई हो. पिछले दिनों ज्योति के पिता का कैंसर से देहांत हो गया था और ज्योति अपने पिता की अकेली संतान है. लिहाज़ा परिवार की ज़िम्मेदारी ज्योति के कंधो पर ही रही है. मगर जब पगड़ी की रस्म का मौका आया तो सामाजिक रस्म आड़े आ गई. क्योंकि रस्मो रिवाज इस मामले में बेटो की हिमायत करते है. लेकिन ज्योति ने पगड़ी और बेटी के बीच सदियों से बने फासले को मिटा दिया

शायद ये पहला मौका था जब बेटी के सिर पिता की पगड़ी बंधी. ज्योति की इस परिवर्तनकारी पहल का परिवार और करीबी रिश्तेदारों ने समर्थन किया. ज्योति के मामा दिनेश कुमार कहते है “ज्योति ने जो किया है,वो सराहनीय है. ज्योति ने कदम बढाया तो उसके पति और ससुराल वालो ने पूरी मदद की और हौसला बढाया. हम ज्योति और उसके ससुराल वालो के जज्बे को सलाम करते है.”
( इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं।)
( This matter was highlighted on शनिवार, 25 अगस्त, 2012 )

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