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-क्या भगवान कभी नींद ले सकते हैं…?

हर धर्म के पवित्र स्थलों पर श्रद्धालुओं के प्रवेश और प्रस्थान करने के नियम हैं। सनातन अर्थात हिंदू धर्म के मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलांे तथा पूजा-पाठ करने के नियम और उनका समय तय किया गया है। मंदिरों के कपाट ब्रह्म-मुहूर्त अर्थात तड़के 4 बजे खुलते हैं और दोपहर 12 बजे के आसपास यही कपाट बंद कर दिये जाते हैं।

चार घंटे के विश्राम के बाद दोपहर बाद और संध्या आगमन से पहले 4 बजे पुनः मंदिरों के कपाट खुलते हैं और रात 10 बजे के बाद कपाट बंद कर दिये जाते हैं। जिस वक्त कपाट बंद रहते हैं उस समय को लेकर सनातन धर्म में प्रचारित किया गया है कि यह समय भगवान के ’’आराम करने अर्थात विश्राम करने’’ का होता है और फिर रात 10 बजे के बाद ’’भगवान भी सोने अर्थात नींद लेने चले जाते हैं’’ इसीलिए उस वक्त कपाट बंद कर दिये जाते हैं। इसलिए इस समय में भगवान की पूजा ना की जाए क्योंकि इससे उनकी निद्रा या विश्राम में विघ्न होता है जिससे ईश्वर नाराज हो जाते हैं।
हालांकि अन्य धर्म के पवित्र स्थलों के नियम भी इसी विषय को लेकर अलग-अलग हैं लेकिन हम सनातन धर्म से जुड़े मंदिरों में श्रद्धालुओं के दर्शन करने के समय को लेकर बौद्धिक जगत और धर्म शास़्ित्रयों के समक्ष यह प्रश्न रख रहे हैं कि ’’संपूर्ण धरा अर्थात पृथ्वी को संचालित करने का दावा करने वाले हिंदू धर्म शास़्त्र., श्रद्धालुओं के मंदिरों में प्रवेश करने के निश्चित समय के प्रतिबंध को लेकर क्यों यह दावा करते हैं कि ’’भगवान इस वक्त आराम कर रहे हैं या निद्रा में हैं’’..? जबकि धर्मशास़्त्री और विज्ञान भी दावा करता है कि ईश्वर के साक्षात रूप अर्थात सूर्य और चंद्रमा हैं जो लगातार पृथ्वी का चक्रमण करते हैं अर्थात पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं…..वे कभी रूकते नहीं हैं और संपूर्ण जगत अर्थात पृथ्वी पर मनुष्य और जीव-जंतुआंे के साथ पशुओं को भी उनके तरीके के अनुसार जीवन जीने और मरण अर्थात मृत्यु का समय तय करते हैं।

धर्म संचालकों को चुनौती देता प्रश्न
मेरा मानना है कि समय चक्र की सुईं बिना रूके लगातार 24 घंटे चलती रहती है। चूंकि मनुष्य, पशुओं, जीव जंतुओं के शरीर में एक जान होती है जो कुछ घंटांे के परिश्रम के बाद विश्राम और फिर जागना चाहती है और निद्रा या आराम के बाद अपनी-अपनी क्रियायें करना। अर्थात एक समय के बाद शरीर जब निढाल हो जाता है और उसमें तीव्रता नहीं होती है तो वह विश्राम मांगता है। यह विश्राम नींद का भी होता है जो 24 घंटे के क्रम में अपना काम करता है। अर्थात मंदिरों में जब ब्रह्म मुहूर्त में तड़के 4 बजे मंदिरों के कपाट खोले जाते हैं तो उसके साथ ही पुजारियों और मंदिरों के सेवक भी जागते हैं और दोपहर 12 बजते-बजते उन्हें 8 घंटे का समय हो चुका होता है तो वह कुछ समय के लिए विश्राम और अन्य कार्य करना चाहते हैं जो कि मंदिरों की स्वच्छता और व्यवस्था से जुड़े विषय होते हैं। यही प्रश्न रात 10 बजे के बाद भी लागू होते हैं जब मंदिरों के कपाट बंद किए जाते हैं। मंदिरों के पुजारियों और सेवकों का शरीर 6 घंटे के उपरात विश्राम करना चाहता है। इस विश्राम काल में ही पुजारियों और सेवकों को शारीरिक उर्जा प्राप्त होती है जो उन्हें अगली सुबह के लिए तरोताजा करती है।

सनातन धर्म के ईश्वरीय दावों के संदर्भ में मेरा यह व्यक्तिगत अनुभवरूपी तर्क ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है कि संपूर्ण धरा को संचालित करने वाला ईश्वर जो कि इंसानों को जीवन देता है, उनका भविष्य तय करता है, उनसे तरह के समयरूपी कार्य करवाता है वह ईश्वर कभी सो ही नहीं सकता अर्थात ईश्वर कभी नींद नहीं ले सकता क्योंकि उसे तो संपूर्ण धरा अर्थात पृथ्वी के विभिन्न कार्यकलापों को संचालित करना होता है।

इसका जीवंत उदाहरण यह भी है कि एक शिशु का जन्म दिन या रात 2 या 3 बजे के समय भी होता है और इंसान की अंतिम सांस भी 24 घंटे में कभी भी निकल जाती है अर्थात ईश्वर रूपी यमराज किसी भी समय आते हैं और अपना कार्य पूरा कर लेते हैं। असंख्य ’’आत्माएं’’ माँ के गर्भ से हर दिन 24 घंटे में जन्म लेती हैं और असंख्य आत्माएं इसी अवधि में शरीर छोड़ती हैं। अर्थात इस धरा को संचालित करने वाला ईश्वर कभी नींद नहीं लेता है और उसका कार्य लगातार जारी रहता है। मंदिरों से संबंधित समय और अन्य धार्मिक कार्यों के समय सिर्फ और सिर्फ इंसान ने व्यवस्था या सुविधा के अनुसार अनादिकाल में तय कर दिये जो समय के साथ व्यवस्था या आदत में परिवर्तित हो गए।

–आप इस तर्क से कितना सहमत है, अपनी राय अवश्य दीजिए।

email. shashvatsatya.delhi@gmail.com

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