है कोई! जिसे कभी ‘सहारे” की जरूरत ना पड़ी हो !
जी हां! जीवन का यह सबसे गूढ़ नहीं बल्कि सार्वजनिक सत्य है कि हर जीव-जंतु, पशु और पक्षी तथा इंसान अपने-अपने समाज में एक-दूसरे के ’’सहारे’’ ही जीवन को चलाते हैं। शायद इस पृृथ्वी पर कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जिसे कभी किसी दूसरे के ’’सहारे’’ की जरूरत ना पड़ी हो। आईये! इस सत्य का विवेचन करें:-
जब इंसान एक शिशु के रूप में जन्म लेता है तो उसे माता-पिता के ’’सहारे’’ की जरूरत होती है। इस ’’सहारे’’ की वास्तविकता को जो माता-पिता या अभिभावक समझते हैं तो वह अपने शिशु या प्रियजन को बेहतर शिक्षा, संस्कार, मानवीय मूल्य और आदर्श जीवन की शिक्षा देते हैं। इसमें परिवार का भी योगदान होता है।
जहां पर माता-पिता इस जिम्मेदारी को विभिन्न कारणों जैसे धन की कमी, नौकरी का अभाव इत्यादि कारणों से पूरा नहीं कर पाते हैं वहां वह शिशु मात्र शारीरिक रूप से बढ़ता है लेकिन उसमें सामाजिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने वाले गुण प्रवेश नहीं कर पाते हैं।
जैसे ही एक शिशु बालक के रूप में प्रवेश करता है तो उसे यहां शिक्षकों के ’’सहारे’’ की जरूरत पड़ती है। शिक्षकों से मिली शिक्षा उसे ज्ञान देती है और ज्ञान ही उसे भविष्य का एक सुयोग्य नागरिक बनाता है। अर्थात एक बालक के भविष्य के विकास में माता-पिता और परिवार के साथ ही शिक्षकों के ’’सहारे’’ की भी भूमिका होती है। शिक्षकों से मिला ज्ञान ही उसे भविष्य का मार्ग दिखाता है अर्थात नौकरी या कारोबार।
इसके बाद इंसान का जीवन वैवाहिक अर्थात दाम्पत्य जीवन में प्रवेश करता है जहां उसे परिवार और संसार को चलाने की जिम्मेदारी मिलती है। अर्थात यहां भी उसे ’’सहारे’’ की जरूरत पड़ती है। जहां पति-पत्नि एक दूसरे का सहारा नहीं बन पाता वहां बिखराव, कलह, कलेश, सम्बंध विच्छेद जैसी नकारात्मक और गलत प्रवृत्तियों को समाज और देश देखता है।
जब इंसान कारोबार और नौकरी में प्रवेश करता है तो उसे यहां पर अपने वरिष्ठों और कनिष्ठजनों, अपने नियोक्ता और सहकर्मियों के ’’सहारे’’ की जरूरत पड़ती है जिनके ’’सहारे’’ वह अपने भविष्य की आधारशिला रखता है। इसी प्रकार जब इंसान अपने किसी परिचित, रिश्तेदार या कारोबार के सिलसिले में घर, परिवार या शहर से बाहर जाना होता है तो वह हवाई जहाज, रेल, बस और अन्य साधनों का उपयोग करता है।
ध्यान देने की बात यह है कि इस यात्रा के वक्त उसकी जिंदगी वाहन, हवाई जहाज, बस और रेल चलाने वाले अर्थात ’’नियंत्रणकर्ता’’ के हाथ में होती है। अगर सम्बंधित ’’नियंत्रणकर्ता ’’ अपनी इस जिम्मेदारी को बखूवी नहीं निभाता है तो सम्बंधित वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है और जो परिणाम निकलता है वह सभी को पता होता है। अर्थात यहां भी ’’सहारे’’ के कारण ही वह अपने गंतव्य तक पहुंच पाता है। कारोबार और नौकरी में भी ’’परस्पर-सहारे’’ के कारण ही कारोबार या नौकरी चल पाती है। पति और पत्नि के बीच भी परस्पर सहारे के कारण ही दाम्पत्य जीवन चल पाता है। आज जो भी अरबपति और विशाल कारोबारी या राजनेता या व्यक्ति हैं उनके जीवन में दूसरे व्यक्ति के ’’सहारे’’ के कारण भी उन्होंने सफलता प्राप्त की होती है। अगर इन लोगों के पास अकुशल, अशिक्षित, नासमझदार और गलत व्यक्ति होते तो क्या वे प्रगति या विकास कर सकते थे…?।
मैंने ये चंद उदाहरण इसलिए दिये हैं कि हर व्यक्ति को ’’सहारे’’ की जरूरत होती है। इस सहारे की आधारशिला सच्चाई, ज्ञान, शिक्षा, सहयोग, मानवीयता और अपनत्व पर टिकी होती है। जो इन नियमों का पालन नहीं करता वह हमेशा हताशा, निर्धनता, असहयोग, अश्पृश्यता, अमानवीयता जैसी नकारात्मक प्रवृतियों का सामना करता रहता हैं।
इसीलिए अपने जीवन में ’’सहारे’’ के महत्व को प्रमुखता दंे। दूसरों को सहारा अर्थात मदद करें तो निश्चित रूप से आप भी उसी ’’सहारे’’ के हकदार बन जाते हैं। बस एक बार पीछे मुड़कर आपको अपना अतीत देखना होगा। इति। लेखक-शेखर कपूर। 3 अक्टूबर 2026।